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Sunday, 19 April 2020

धर्म की बात


भारतीय समाज अपने धर्म-ग्रंथों के पन्नों से ही अपने समय-पथ पर अग्रसर होता रहा है। आदिकाल में जब सतयुग हो या वर्तमान का कलियुग, इन्हीं ग्रंथों ने हमें दिशा दिखाई है और पुरातन की सत्यता से रूबरू कराया है। अब उस सत्यता का यथार्थ ज्ञात करना तो हमारे विवेक की साधना पर आश्रित है। बहरहाल, इन ग्रंथों में मैं प्रभु श्री राम और श्री कृष्ण से काफी प्रभावित रहता हूँ। एक अलग-सा लगाव है इनसे जो इनके काल, इनके जीवन और इनसे जुड़ी लेखनी से बाँधे रखता है।
इनके व्यक्तित्व का महत्व और भी तब बढ़ जाता है, जब इनका व्यक्तित्व इनके काल-खंड का द्योतक बन कर, काल-पटल पर उभर आता है। सतयुग ने श्री हरीशचंद्र स्वरूप में एक व्यक्तित्व को प्रदर्शित किया। त्रेतायुग ने समस्त मानवीय रूपों में केवल श्री राम की सरसता में ही अपनी मर्यादा को परिलक्षित किया। द्वापरयुग में श्री कृष्ण की सर्वशक्तिमान छवि और उनकी कलाओं की अधिकता, उस युग की जटिलता को आज भी प्रज्ज्वलित रखते हैं। अन्तः मेरी कलियुगे ! इसी आस में इतने वर्ष बिता चुकी है कि काश किसी ऐसी आत्मा का बाह्यशरीर इसकी धरा को अनुग्रहित कर पाए। मानने वाले श्री कल्कि को उस पूर्णरूपेण, ध्रुवीय परिचय में देखते हैं। किंतु, कलि की विडंबना ही यही रही है कि इस इंतज़ार में इसकी सभी मानवीय-घड़ियों में अपनी क्रीड़ा से कर्म को पूरित करने वाले मनुष्य ऐसे ही व्यक्तित्व के अभाव में, स्वतः अपने विचारों, अपनी क्रियाओं को किसी ऐसे पक्ष में बाँट लेते हैं जो उन्हें श्रीराम-सा मर्यादापुरुषोत्तम और श्रीकृष्ण-सा सशक्त बना देता है। यह छद्म-स्वरूप उनका, केवल अपनी मिथ्या में ही सीमित रहता है। लेकिन, इस मृगतृष्णा से वे ख़ुद को इस हद तक परिपूर्ण महसूस कर पाते हैं कि तुरन्त हर किसी-न-किसी को ईर्ष्या से लिप्त अपने शाब्दिक बाणों से घायल कर देते हैं।

कलियुग के ये भ्रमित लोग, समाज के लिए सबसे बड़ा ख़तरा हैं। उनकी छद्म परिपूर्णता जो उनकी लघुता का परिचायक है, उन्हें कुछ भी नया सोचने या नया करने से रोके रखेगी। समाज में कुछ बेहतर करने वाले लोग उनकी आँखों को फूटे नहीं समायेंगे। यही लोग कल्कि के आगमन में विलंब का कारण बनेंगे। उनके आगमन पर, उनके प्रथम विरोधी भी यही होंगे। भगवत स्वरूप के समान स्वयं को बनाने का उद्देश्य रखना गलत नहीं है। गलत है बिना कुछ किये, बगैर रघुकुल-तिलक-सी विरह सहे, बिना किशन-सा संघर्ष किये, उनके पद पर अपने आप को देखना। गरुण-पुराण में इसके लिए अलग से सज़ा होनी चाहिए। इससे अधिक घातक कोई मादकता नहीं। सोच को खत्म करने का इससे कोई बड़ा मार्ग नहीं। 


कौन हैं ऐसे लोग?

जो चार चेहरों पर चार बातें करें,
जो बच्चों को झूठा बनाते चलें,
जिन्हें हिज़्र में कमजोरी दिखे,
जो प्रणाम को भी ठुकरातें चलें।
कुछ उदाहरण आसपास से :-
जो आज भी ड्यूटी करने वालों के लिए बुरी नियत पाले हुए हैं,
जिन्हें सिया-राम का विछोह ज्ञात नहीं हो रहा हो,
जो "आज का समय ही खराब हो गया है" बोलकर चुप बैठे हों,
जो तनख्वाह नहीं पा रहे शिक्षकों की स्थिति देखकर भी सरकार के साथ हो,
जो चाटुकारिता में अव्वल हों,
जो लोगों के परिवार तोड़ते हों,
जो मुफ्तखोर हों,
जो इनका गौरकर्ता हो,
जो आलस पर ही मरता हो।


निदान : 

सबके पक्षों को समझिए।
बातों को स्पष्ट रखिये।
अपनी गलती को मानिए।
राजनीति को जूते की नोक पर रखिये।
शिक्षकों के सम्पर्क में रहिये। उनकी बात थामिए। 
यही धर्म की बात है।

Wednesday, 7 June 2017

नैंसी झा के लिए

तेज़ाब!
तेज़ाब देखा है क्या किसी ने यहाँ?
उसे कभी स्पर्श किया है क्या?
चलो स्पर्श छोड़ो उन मादक तत्वों के साथ कभी दो घूंट पिया है या नहीं?
अगर नहीं पिया तो समय है। अब भी मुँह लगा कर देखो उसे।
मुख-मण्डल पर ऐसे भाव क्यों छा रहे तुम्हारे?
कुछ गलत कह गया क्या?
तेज़ाब से बेहतर तो कुछ है ही नहीं इस जहाँ में।
यकीन नहीं होता तो मधुबनी की लाडली से ही पूछ लो।
उद्गार ऐसे प्रकट करेगी कि निःशब्द रह जाओगे। आखिर इस दुःख दायी कलियुग में कुछ तो है तो सभी कष्टों का एकाक निवारण करता है।
मादकता ऐसी की महादेव का भांग भी स्वयं को तुच्छ समझे।
तरलता ऐसी की मदिरा भी ठिठक-सी जाए।
गम्भीर इतना कि एक बूंद भी पूरा जीवन याद आये।
उत्कृष्टता ऐसी की विदेशी भी ठुकरा दी जाए।
ढूंढ़ने में बिल्कुल आसान।
भाइयों दाम में कम और काम में तो बस दम ही दम।
क्या अब भी आपको मज़ाक ही लग रहा है?
अरे भाई! अगर इस दानवीरों को छोड़ दानवों को पूजने वाले युग में कोई किसी अपने के लिए ऐसी चाहत रखता है तो यह खराब तो नहीं ही होगा। जो मेरे शब्द आपको इतना चुभ रहे हैं।
गर मैं गलत हूँ तो बताइए
क्या आवश्यता थी जो उस मनचले आशिक़ ने अपने प्रेम का इज़हार इस भेंट के माध्यम से किया?
क्या कमी रह गयी थी को नव विवाहित वधु का परिणय-सूत्र के पीयूष के बदले इसकी धार से अभिषेक कराया गया?
क्या गलती हो गयी थी कि नौकरी से लौटते वक्त अपने ही मित्रों ने इसका अंजलि भर दान षोडषी के चेहरे को अर्पित किया?
या फिर शायद चाचा और बुआ नें कुछ सोच कर ही तो उस मासूम बच्ची से इसका रसास्वादन कराया?
आप ही का कहा हुआ है ना, "अपने लोग हैं।इनकी बात मानो।"
माना तो इसने। इसने क्या इन सब ने।
फिर तो ये दिव्य उपहार उस अपनेपन की निशानी हैं शायद।
है ना?
नहीं?
आश्चर्य है तब तो।
वैसे आपकी भाव भंगिमा तो गम्भीर नज़र आ रही है अब।
चलिये मैं भी गम्भीर हो लेता हूँ तब।

तेज़ाब की जलन से कहीं ज़्यादा वेदना देती है उस पापी-दुष्कर के समक्ष आपकी चुप्पी तथा अम्लीय-घावों में डूबे उस कुटुम्ब के लिए आपके प्रश्न।
निर्लज्जता की किस पराकाष्ठा पर जाकर रुकेंगे आप?
मेरे शब्दों में परमात्मा की वह मासूम अंश आरोपी देखती है आपको जो महिषासुर जैसे राक्षस की पूजा न होने पर मानवता में विनाश की लहर देखते हैं और वहीं दुर्गा के चरित्र पर तेज़ाब फेंके जाने को ज्ञान की अभिव्यक्ति के रूप में सहर्ष स्वीकार करते हैं।
कैसा है आपका यह ज्ञान जो माँ, बहन, बेटी, शिक्षिका; सब को व्यभिचार के एक ही दृष्टिकोण में समेट लेता है और आपको इसकी तनिक भी ग्लानि नहीं होती।
खैर छोड़िये मुझे आपसे वैसे भी कोई उम्मीद नहीं है।आप नहीं, आपकी परवरिश का यह दोष है।
जिनमें ज़रा भी ग़ैरत बची है वे इस बात को समझें कि तेज़ाब की हर एक बूंद हमें नहीं किन्तु आपको नष्ट कर रही है।
आपके ही भव-सागर के पार जाने वाली नैय्या के ये छिद्र हैं जो ऐसा ज़ख्म दे जाते हैं।
सो, समय रहते सुधार कीजिये।
अन्यथा पुराणों के कल्कि को शायद इन्हीं अभिशापों से मुक्ति का मार्ग आपकी रक्त-सरिता के निर्माण से करना होगा।
तब तक मेरे हर अश्क की खातिर आप सब को नित रो-रो कर जीना होगा।