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Saturday, 22 September 2018

स्त्री का दर्द-2-घरेलू हिंसा

रात चाँदनी रही,
बात चाँदनी रही।
भले ही काल, काल हो;
साथ चाँदनी रही।

सदैव ही निकट रही,
चाँदनी लिपट रही।
वो हर घड़ी अतीत के,
प्रेम में सिमट रही।

परंतु व्यर्थ ही रही,
कभी निरर्थ भी रही।
वो सोच से गिरों के बीच,
सदा "अनर्थ" ही रही।

बदन के मार सह रही,
वो रोज़ हार सह रही।
कुल-निर्लजों के हाथ,
"निज-उद्धार" सह रही।

थी जानती नहीं रही,
थी मानती नहीं रही।
मनो-वियोग में भी थी,
रार ठानती नहीं रही।

वो शांत भी बनी रही,
प्रशांत भी बनी रही।
वो आग के स्पर्श पर,
अशांत भी बनी रही।

वो देखती ही रही,
वो सेंकती ही रही।
घोर अत्याचार में,
वो माथ टेकती रही।

प्रभु को पूजती रही,
ख़ुदी से जूझती रही।
वो पूर्व-प्रीत-मोह में,
ज़वाब ढूँढती रही।

वो अब नहीं चपल रही,
न सोच में सरल रही।
वो एक घाट बाद से,
स्वभाव में गरल रही।

वो अंत तक सबल रही,
कभी नहीं अबल रही।
सुता के हित जो बात थी,
सदा ही वो प्रबल रही।
                      - सुखदेव।

स्त्री का दर्द-1- हिय-कसक

अकेले हम भी रहते हैं, अकेले तुम भी हो रहते।
बग़ावत हम भी करते हैं, बग़ावत तुम भी हो करते।
समय की आँधियों में जो, चला करती हवाएँ हैं;
अकेले हम भी सहते हैं, अकेले तुम भी हो सहते।

शराफ़त हम भी रखते हैं, शराफ़त तुम भी हो रखते।
नज़ाकत हम भी रखते हैं, नज़ाकत तुम भी हो रखते।
परंतु, गैरों के उलाहनों से बचने की कवायद में;
हिफाज़त हम भी करते हैं, हिफाज़त तुम भी हो करते।

शरारत हम भी करते हैं, शरारत तुम भी हो करते।
हरारत हम भी भरते हैं, हरारत तुम भी हो भरते।
छिपी दुनिया की गद्दारी में, डूबी मुस्कुराहट में;
बनावट हम भी धरते हैं, बनावट तुम भी हो धरते।

ये चाहत हम भी रखते हैं, ये चाहत तुम भी हो रखते।
विरासत हम भी रखते हैं, विरासत तुम भी हो रखते।
ओ मनके! बीतती बातों की जलती-सी चिताओं में,
तिजारत हम भी रखते हैं, तिजारत तुम भी हो रखते।

हिमायत हम भी रहते हैं, हिमायत तुम भी हो रहते।
हिमाकत हम भी रखते हैं, हिमाकत तुम भी हो रखते।
भले ना उम्मीद हैं, पाने में हम दोनों हीं;
मोहब्बत हम तो करते हैं, मोहब्बत तुम नहीं करते।
                                                         - सुखदेव।