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Saturday, 22 September 2018

स्त्री का दर्द-4- पीड़िता का अपराधीकरण

संघर्षों के मदिरालय में,
सबसे सस्ता जो जाम उठा।
द्रवित हुआ मन पूछता है,
क्यों उसपर तेरा नाम उठा?

सभी अधम थे, सभी नीच भी;
सबपर दुष्कर ने राज किया?
फिर भारी सभा में बैठे ही,
क्यों सब ने ऐसा काज किया?

तुम शुचिधर-सुंदर, थी सुशील;
इस पर चंचलता बनी कील।
हुआ सूर्यपुत्र का भी छन्न शील,
वह स्वर्ण आर्य वहाँ हुआ नील।

जो दुष्ट अनुज ने केश तुम्हारे,
खींच तुम्हें झकझोर दिया।
तुम करती भी क्या जब भरी सभा ने,
मुख इस दुष्कर्म की ओर किया।

वहीं तुम्हारे धर्मराज थे,
वहीं था तेरा निश्छल साईं।
वहीं बगल में प्राण-नाथ भी,
वहीं थे दोनों कोमल भाई।

वहीं थे सारे परम-प्रतापी-
पराकाष्ठा-पर के पैर।
वहीं सन्न था परशु-शिष्य,
बाँधे अपने अंदर बैर।

सारे तो थे बौराये-से,
धर्म-द्युति परवान चढ़ी।
उन सब में बस वही एक था,
जिसने बदले में शान गढ़ी।

तुम बोलो अब करती क्या,
जब ऐसे वीर पड़े मजबूर।
जिन्हें प्रतिकार की चाहत थी,
वो अंतर में थे होते चूर।

ऐसे में तुमने प्रभु बुलाकर,
था अच्छा-सा काज किया।
उनकी महिमा की छाया में ही,
तुमने आखिर तक राज किया।

क्या हक़ था तब परमपूज्य को,
जिससे वो तुम पर चाल चले।
क्या मानु! वो शैशव में;
थोड़ा-सा जैसे बहक गए।

कब तक नारी, हे शशिप्रभा!
कुछ पन्नो-पत्रों में तोली जाएगी?
कब तक आएगा वो समय कि जब,
दुनिया उसका सच्चा मोल समझ पाएगी?

हो रामराज में सीता माँ,
या द्वापर में हो द्रौपदी।
या कलियुग में निर्भया,
क्यों अबला पर ही ज़िद गुज़री?

ये बातें जो थर्राती हैं तुरंत,
देती हैं सीख महत्वपूर्ण अत्यंत।
उस पुरुष रूप के राक्षस का,
केवल माँ अम्बे, करती हैं अंत।
                            -  सुखदेव।

स्त्री का दर्द-3-वैवाहिक बलात्कार

प्रणय-सूत्र में पिरो-पिरो कर,
उसने मुझको लूटा था।
मैं तो बस चुपचाप पड़ी थी,
जब ये मेरा दिल टूटा था।

आशाओं की नैया में तब,
छिद्र-छिद्र ही छूटा था।
सारे रिश्ते दूर खड़े थे,
जब वह वहशी टूटा था।

शर्मायी-सकुचाई-सी मैं,
उसका व्यभिचार ही फूटा था।
भावों को कोई जगह ना मिली,
करम हमारा फूटा था।

अहो मनके! तुम देख सको तो,
बूझो क्यों "मन" टूटा था?
वधु हुई जो वैसे वर की, मेरा;
सत्य भी जिसको झूठा था।

मेरी शुचिधर-काया मलिन की गई,
तन विधियों से उसका धूता था।
अब प्रणय ना रहा, "सूत्र" छिन्न था;
बस, अंश शिशु-सा छूटा था।
                           - सुखदेव।

स्त्री का दर्द-2-घरेलू हिंसा

रात चाँदनी रही,
बात चाँदनी रही।
भले ही काल, काल हो;
साथ चाँदनी रही।

सदैव ही निकट रही,
चाँदनी लिपट रही।
वो हर घड़ी अतीत के,
प्रेम में सिमट रही।

परंतु व्यर्थ ही रही,
कभी निरर्थ भी रही।
वो सोच से गिरों के बीच,
सदा "अनर्थ" ही रही।

बदन के मार सह रही,
वो रोज़ हार सह रही।
कुल-निर्लजों के हाथ,
"निज-उद्धार" सह रही।

थी जानती नहीं रही,
थी मानती नहीं रही।
मनो-वियोग में भी थी,
रार ठानती नहीं रही।

वो शांत भी बनी रही,
प्रशांत भी बनी रही।
वो आग के स्पर्श पर,
अशांत भी बनी रही।

वो देखती ही रही,
वो सेंकती ही रही।
घोर अत्याचार में,
वो माथ टेकती रही।

प्रभु को पूजती रही,
ख़ुदी से जूझती रही।
वो पूर्व-प्रीत-मोह में,
ज़वाब ढूँढती रही।

वो अब नहीं चपल रही,
न सोच में सरल रही।
वो एक घाट बाद से,
स्वभाव में गरल रही।

वो अंत तक सबल रही,
कभी नहीं अबल रही।
सुता के हित जो बात थी,
सदा ही वो प्रबल रही।
                      - सुखदेव।

स्त्री का दर्द-1- हिय-कसक

अकेले हम भी रहते हैं, अकेले तुम भी हो रहते।
बग़ावत हम भी करते हैं, बग़ावत तुम भी हो करते।
समय की आँधियों में जो, चला करती हवाएँ हैं;
अकेले हम भी सहते हैं, अकेले तुम भी हो सहते।

शराफ़त हम भी रखते हैं, शराफ़त तुम भी हो रखते।
नज़ाकत हम भी रखते हैं, नज़ाकत तुम भी हो रखते।
परंतु, गैरों के उलाहनों से बचने की कवायद में;
हिफाज़त हम भी करते हैं, हिफाज़त तुम भी हो करते।

शरारत हम भी करते हैं, शरारत तुम भी हो करते।
हरारत हम भी भरते हैं, हरारत तुम भी हो भरते।
छिपी दुनिया की गद्दारी में, डूबी मुस्कुराहट में;
बनावट हम भी धरते हैं, बनावट तुम भी हो धरते।

ये चाहत हम भी रखते हैं, ये चाहत तुम भी हो रखते।
विरासत हम भी रखते हैं, विरासत तुम भी हो रखते।
ओ मनके! बीतती बातों की जलती-सी चिताओं में,
तिजारत हम भी रखते हैं, तिजारत तुम भी हो रखते।

हिमायत हम भी रहते हैं, हिमायत तुम भी हो रहते।
हिमाकत हम भी रखते हैं, हिमाकत तुम भी हो रखते।
भले ना उम्मीद हैं, पाने में हम दोनों हीं;
मोहब्बत हम तो करते हैं, मोहब्बत तुम नहीं करते।
                                                         - सुखदेव।