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Wednesday, 29 April 2020

--- उम्मीद की आवाज़ ---


कभी रात जब रेल की यूँ,
आवाज़ सुनाई दे जाती है।
मन में ही मन मारे मानव को,
आगाज़ दिखाई दे जाती है।

एक आगाज़ जिसके होने भर से,
टूट जाएगा फिर लॉकडाउन,
बाहर निकलेंगे मानव और,
रख आएँगे सब भय डाउन,
भले अपने मन के ही तहखाने में,
कुछ जाने में, कई अन्जाने में।

परंतु, एक बात तो इस स्वप्न-सरीखे 
से छुपी नहीं,
वो बात जो धोखे के खंज़र-सी घुपी नहीं।
यही की इन सब के बीत जाने के बाद,
हमारा निज नाम कमाने के बाद,
ये भय कहीं नहीं जाएगा।
जहाँ होगा मानव,
इसे भी संग पायेगा।

ये मृत्यु का भय नहीं है।
ये निराशा का भय है।
समस्या भीतर बन्द होने में नहीं है।
उस बन्द होने के पाबन्द की समस्या है।
यही है वो जो मानव अपने बहन के विवाह पर सोचता है,
या किसी अन्य भोली और स्वच्छंद कन्या के लिए सोचता है,
या किसी ख़राब रिश्ते में स्वयं के लिए सोचता है।

यह वही भय है,
कि जब गाड़ी की सीटी सुनाई दे जाए।
पर उम्मीद न बने,
हताशा की कालिमा हटाई न जाये।

हे बहन! ऐसे में तुम नौकरी धर लेना,
कमाना बहुत के
रकम से खामियाँ ढक लेना।
तुम्हारा जीना फिर सरल हो जाएगा।
किसी और गले,
बेरोज़गारी का जमा, गरल हो जाएगा।

हे कन्या! तुम जो भी हो,
जैसी भी हो?
अपना प्रतिकार अमर रखना।
उस रेल की ध्वनि परखने को,
सदैव कसकर कमर रखना।

हे मानव! तुम अपनी ही बात पर क्या हल लोगे?
हो जाएगी सुबह, व्यर्थ ही पल लोगे।
अपनी दृष्टि में बस गोचर रखना।
हर कर्म को दृष्टिगोचर रखना।
वैसे जीना बस, जीना नहीं,
साधना होती है।
सत्य का यथार्थ और यथार्थ का सत्य जानना ही,
उस पूज्य गाड़ी की असल आराधना होती है।

जीवन का कोई भी कोरोना हो,
या वक़्त का कोई तंग कोना हो,
अपने शर्तों पर यूँ ही अड़े रहना,
सुनने को पटरियों पर भागती वह तान,
अपनी चेतना के कान खड़े रखना।
                               - सुखदेव।




Tuesday, 14 April 2020

---- कोरोनामर्दिनि-स्तुति ----

नमन तुम्हें दुर्गे है मेरा,
नमन करो स्वीकार।
सृष्टि अबकी त्राहि-त्राहि करे,
में जन-जन हाहाकार।
दुर्गे नमन करो स्वीकार।

ड्यूटी पर जितने हैं कर्मी,
है उचित जहाँ व्यवहार।
निश्चित हैं सच्चे वो धर्मी,
जय नव-पीढी के कुम्हार।
दुर्गे नमन करो स्वीकार।

इस संकट में नासिका हमारी,
भीगी जैसे करतार।
है बन बैठी जब नाक तुम्हारी,
अब खींच भी लो तलवार।
दुर्गे नमन करो स्वीकार।

ये असुर भी हैं पूरे ही ततपर,
जहाँ लोग बने हथियार।
हम बाँधें हैं हाथों को कसकर,
केवल तुम्हीं रही आसार।
मैय्या नमन करो स्वीकार।

अबतक जितना है जग में,
सब आपका ही तो है अम्बार।
कृपा सदा बस बनी रहे औ,
ग्रहण हो सबके नित आभार।
दुर्गे नमन करो स्वीकार।

आपकी दृष्टि होती है जो,
होते हैं निज पर उपकार।
इस जीवन में साँसों के संगी,
हैं जुड़े आपके सब उपहार।
दुर्गे नमन करो स्वीकार।

कुल की हो तुम अनंत मातु-वट,
तुम्हें सब दिन पूजे हैं नर-नार।
सदा निश्चिंत हो ध्यावें सब धन,
तुम सबकी पालनहार।
दुर्गे नमन करो स्वीकार।

देवी वैष्णव, काली, अम्बा, कपालिनी;
अन्नपूर्णा, जगदम्बे, शक्ति, कोरोनामर्दिनि;
जय विंध्यवासिनी, भवानी, ताराचण्डी;
माँ मुंडेश्वरी, शारदा, महिषासुरमर्दिनि;
हे कोरोनामर्दिनि, नमस्ते जीवन-दायिनी।
सुखदेव-नमन देवी धरें, नमस्ते नारायणी।

Monday, 9 March 2020

Another year, another women's day


Happy Women's day to all the women out there. 
We - the current generation of this world, belong to a society that has a history of writing histories. We may be a part of an accident cult, a peace-loving community, a goal driven crusade, a truth seeking culture or the sanatan dharm. But, we all have a similarity that is unnoticed to none. We are all part of a lineage that finds solace in sexual polarity and gender-based inequalities. All our societies have : 
a man that by every passing day, is transforming more and more into Super Man, (in his own praise-laden words), and
a woman that by all means is represented by analogies that show her in weak light, keeping here tied in the shackles of the second-sex.

Every year, if we are aware, we can see a whole new colour to people's personality, around us. Based on the observations of the past years, I can proudly say that I am in acquaintance with women who have shown their capacity in every segment of life that an average student witnesses. I see them leading from the front when it comes to : 
teaching a class, 
silencing a mass,
rash-driving,
truth striving,
commencing a protest,
displaying detest,
sexist abuses,
rational excuses,
killing a gossip spree,
letting live literature's tree,
being the moral compass,
picking the bit of sass,
seeing the winter come,
emptying stacks of rum,
defying threats of COVID 19,
being ever ready for the unforseen,
having the back of family,
living the days all happily.
So I wish a very happy women's day to all women, all kinds of women. 
You all are the Super Women, which even Shaw could not perceive. 
Thank you for making this world, a less chaotic mess.
                     - Sukhdev.



Friday, 8 March 2019

महिला दिवस, '19

8 मार्च का स्वागत है लेकिन कुछ गौर करना आवश्यक है।

आज सभी के साथ हम सब भी "महिला दिवस" के माहौल में मश्गूल हैं। लोग जगह-जगह, मेरी तरह ही अपने उद्गार गिराते चल रहे हैं। पलट कर देखने पर किसी मवेशी द्वारा सड़क पर छोड़े गए अवशेष की तरह दिखाई दे रहे हैं ये। मात्र अनावश्यक गन्दगी।
हो भी क्यों न। ये ऐसा दिन है जिसकी आड़ में,
साल भर अपनी hipocracy और chauvinism में लिपटे कामों में लड़कियों पर शारीरिक और मानसिक अत्याचार करने वाले लोग,
आज के दिन का इस्तेमाल अपनी छवि सुधारने में करते हैं।
आश्चर्य होता है देखकर कि जिस व्यक्ति को एक क्षण नहीं लगता अपनी बातों से किसी दुपट्टे वाली की इज़्ज़त उतारते या दरवाज़े के पीछे से,
विरोध जता रही किसी "निक्करवाली" को औकात याद रखने की नसिहत देते।
वैसा नीच आदमी भी आज बैनर लेकर महिलाओं के हक़ की आवाज़ लगाने निकल पड़ता है।
इसलिए, उन सभी girls, sisters, ex-es, friends, enemies, professionals, aunts, mothers... से विनती है कि आप life में जिस भी social-role में व्यस्त हैं। ऐसे लोगों की हुँकारों से बचें। ये खलु जीव, आपके हौसलों के पर को सबसे पहले काटने आएंगे। इसलिए, हर किसी को परे रख सिर्फ, अपने आप को साथ लेकर आगे बढिए। इस लड़ाई में भाग्यवश, कोई आपके साथ नहीं खड़ा है।
सोचता हूँ क्या आप की महत्ता इतनी ही रह गयी है कि "एक दिन दे दिया न, अब कैंची जैसी ज़बान बन्द रखो।"
अपनी महिला वाले रूप से ऊपर उठिये। Equal rights के बदले EQUITY के लिए आवाज़ उठाइये।
आपको सम्मान इसलिए थोड़े ही मिलना चाहिए क्योंकि आपके किसी undeservant-male-counterpart को मज़बूरी में मिल रहा है। शायद इसीलिए, आज हम "महिला" दिवस मना रहे हैं।
महिला - पुरुष के विलोम का शब्द।
आप इतने में ही सिमटी हुई हैं क्या?
मैं नहीं मानता। आप तो नारी हैं, स्त्री हैं, औरत हैं, वनीता हैं, अबला हैं, कान्ता हैं, चपला हैं।
सब कुछ हैं बस इस तुच्छ पुरुष का विपरीत मात्र नहीं हैं।

Thursday, 28 February 2019

ये क्षणिक पुकार

चौकीदार हमारा अच्छा है।
पर संगत उसकी कैसी है?
इस पर चर्चा होनी होगी, जो;
अमन कि फिज़ा ऐसी है।

जिस उदित सूर्य में घर को हम,
बेटा अपना ले आएंगे।
उस शाम के ढलने से पहले,
उनको भी होश दिखाएंगे।
जो पर्चा लेकर घर-घर में,
जाकर के नाम बुलाते हैं।
कुछ को पहले ही विदा किये,
कुछ से नारे लगवाते हैं।
जो नारे उनकी मर्ज़ी के,
उनकी इच्छा को भाते हैं।
वो उन लोगों को चुनकर के,
औरों से परे हटाते हैं।
अपने निर्लज्ज मंचों से फिर,
उन्हें देशभक्त बतलाते हैं।
फिर उन सबको जो छूट गए,
पाशों में बाँधते जाते हैं।

क्या वक़्त है जब दूजे हमको,
संकल्प याद दिलवाते हैं?
अन्यथा उन्हीं के मुख हमको,
जाने क्या-क्या दर्शाते हैं।

इस पर भी तो प्रहरी अपना,
मौन नज़र ही आता है।
उसका विपक्ष भी छोड़ हमें,
तो राग भिन्न ही गाता है।

सुखदेव निराश न होना तुम,
जो दिखे वही हर बात कहें।
भूलो मत अपनी ही धरती पर,
आखिर रघु भी वन वास सहें।

वो बोलेंगे, दिल खोलेंगे;
मौके पर जी भर रो लेंगे।
पर तुम बस अपना थामो शर,
टिकना डटकर के चुनाव भर।
रामायण से जो भी दूर लगे,
उसे वोट न दो, उसे कर दो तर।

ढूँढो जिसे राम जी भाएँगे।
जिसे लखन लाल अपनाएंगे।
माँ सीता जिसको वर देगी,
औ भरत भ्रातृ हर्षाएँगे।

हाँ! प्रभु तुम्हारे अपने हों।
न किसी और के सपने हों।
हनुमत के सच्चे स्वामी हों,
न ही किंचित भी अभिमानी हों।

घबड़ाओ नहीं इस एकाकी में,
सबका मन तुमने है पढा नहीं।
ये वेदों की पावन भूमि है, इसने
निज-संघर्ष बिना कुछ गढ़ा नहीं।
                                - सुखदेव।

Tuesday, 22 January 2019

बेटा आये तो अच्छा है।

एक ठिठुरते दिन की बात है। मैं हमेशा की तरह अपनी अपनी नियत गश्त पर निकली थी। जिस प्रकार सविता सदैव संध्या का सान्निध्य पाते ही समेटने लगता है अपने सभी अंशु रूपी सवालों को। उसी प्रकार मैं भी ढ़लती शाम के साथ सर सुंदरलाल अस्पताल के प्रसूति विभाग के मरीजों की स्थिति समझती बढ़ रही थी। काफ़ी व्यस्तता भरा दिन था वह। शायद इसीलिए थकान के मद में चूर मेरे शरीर को सामने के सभी बिस्तर, मेरे जोधपुर कॉलोनी वाले मकान की मंज़िल से दूरी बढ़ाते अवरोध ही जान पड़ रहे थे। वही मंज़िल जहाँ मेरा रवि अपने स्वादिष्ट परांठों के साथ मेरी राह देख रहा था। कल तो लौटा था वो अपनी वर्दीवाली ड्यूटी से। उस क्षण अपने फर्ज़ की अचकन को मैंने मन-ही-मन टाँग दिया तथा कुछ फुर्ती से, कुछ लापरवाही में उन सभी निपटाना प्रारम्भ किया। खुद पर हँसी भी आ रही थी मुझे क्योंकि अपना बर्तन माँजना याद आ रहा था अभी।

किसी तरह दूसरा कक्ष पार करके जब मैं आगे बढ़ी तब मुझे वो कल वाला बच्चा दिखा। बड़ा प्यारा लग लग रहा था कल वो। उसकी माँ भर्ती है यहाँ। दोनों पति-पत्नी ने शुरुआत में कभी किसी रिश्तेदार को दिखाया था मुझे। बहुत पहले। शायद जब मैं सीख रही थी। मुझे तो याद भी नहीं। खैर, मैंने यूँ ही उसे छेड़-सा दिया। पर इस बार उसने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। न गुर्राया, न माँ से शिकायत की धमकी दी। न ही अपने चाचा के कुर्ते को खींचने का बीड़ा उठाया। चुपचाप हाथ जोड़कर श्रीराम का नाम लेकर कुछ बुदबुदाता रहा। मुझे जिज्ञासा हुई। मैंने भी सोचा जो मरीज़ जाँच के वक़्त मेरे व्हाटसअप के इस्तेमाल पर उफ्फ़ तक नहीं करते उन्हें इस प्रभु-छवि के यहाँ थोड़े विराम पर कोई आपत्ति नहीं ही होगी।

सो मैंने झुककर उससे पूछा, " और अर्श, क्या कर रहे हो?"

उसने बड़ी मासूमियत से जवाब दिया, " डॉक्टर, मैं भगवान को एक बहन भेजने के लिए मना कर रहा हूँ। कल ही मांगा था मैंने।"

बालमन के इस सटीक और भोले जवाब ने गुदगुदा दिया मुझे।
" फिर आज क्यों रोक रहे हो? ऐसा क्या हो गया?",मैंने मुस्कराते हुए पूछ लिया।

इस पर उसने मुझे जो उत्तर दिया। उसने मुझे अंदर तक झकझोर दिया। किसी पुराने घाव को फिर से निचोड़ दिया। ऐसा ज़ख्म जिसका इलाज विश्व के किसी चिकित्सक के पास नहीं था। उस रात मैं घर भी नहीं गयी। रवि और उसके परांठे, उसकी किताबों के संग ही सो गए। मैं अपनी कुर्सी पर ही सन्न बैठी रह गयी।

उसने कहा, ' सुबह मैय्या, पितु से कह रही थी कि," बेटा आये तो अच्छा है। कम-से-कम भटका भी तो लौटकर घर ही आएगा।"'
                        - सुखदेव।

हमें बेटी नहीं चाहिए।

शाम हो चली थी। सर सुंदरलाल अस्पताल परिसर का माहौल भी लौटती सविता के आलोक में खिन्न आकाश का प्रारूप दिखा रहा था। अधिकतर कर्मचारी आठ बजे की अपनी कार्मिक-पाली के अंत की आस में घड़ी को देख आहें भर रहे थे। मरीज़ एक और दिन यहाँ के अस्वच्छ बिछौने पर कूल्हे टिकाये मज़बूर पड़े थे। सभी अपने मन के किसी कोने में चिकित्सकों की सात बजे वाली गश्त में स्वयं की रिहाई की प्रार्थना कर रहे थे। परिजनों के मध्य आपाधापी अपने चर्मोत्कर्ष पर पहुँचने को थी। उनके मुखपर डॉक्टरों के लिए व्याप्त शुद्ध बनारसी उद्गार ये प्रदर्शित करते हैं कि परिसर में काम अवश्य हुआ है। बनारस में शब्दों को नहीं, ज़िक्रों को महत्व दीजियेगा। तल्लीनता हालिस होगी।

ख़ैर, इस उदासीन-आलस भरे वातावरण में एक सफ़ेद अचकन की स्फूर्ति सबका ध्यान आकृष्ट कर रही थी। महिला एवं प्रसूति वार्ड में कॉलर पर परिश्रावक टिकाये डॉक्टर कारुणि आज अपने उत्साह पर वारी जा रही थी। शीघ्रता से उसने बाँये हाथ की सूची देखी। तेइसवाँ बिस्तर था यह। दीवार पर ठीक सामने अंकित वही संख्या उसकी इस हरकत से खिलखिला उठी। शायद उसे इस हड़बड़ी का राज़ ज्ञात हो गया था।

चौबीसवीं मरीज़ की स्थिति आज काफी बेहतर थी। उनकी गर्भाशय सर्जरी परसों हुई थी। उसे याद आया कल तो दर्द से ये चीखें ही जा रही थीं। किन्तु मानना पड़ेगा इनके साथ खड़े बच्चों को भी।
" उन्होंने मुझे भी इनके साथ एक वयस्क परिजन की कमी नहीं खलने दी। याद है जब उन्हें उठना था तो उनके बेटे ने कितनी सफाई से कन्धों को टेक दी। मानो एक आह! नहीं आती कि सबकी आँखें भारी हो जातीं।", डॉक्टर अनामिका ने सुबह-सुबह ये कहा था।
बाद में वैभव ने बताया कि वे सब उनकी बेटी के दोस्त थे। वो स्वयं किसी परीक्षा के सिलसिले में बाहर थी। अच्छा परिवार है इनका।

" सिस्टर! सिस्टर! तनी हमे बोखार बदे कुछ दे देतु।"
सामने खड़े परिजनों में से एक की कर्कशाहट ने कारुणि के अंतर्ध्यान को तोड़ा। प्रसन्नता की इस कहकशाहत में भी उसका क्रोध शांत नहीं रह सका। इतनी बेड-संख्याओं के बीच पान खाने की सज़ा की आड़ में उसने उस महिला को फट्कार कर बाहर कर दिया। " डॉक्टर और नर्स में बहुत फर्क है। न जाने ये गँवार कब समझेंगे। बड़ी आयी सिस्टरवाली।" उसने मन में सोचा। फिर चहकते हुए आगे बढ़ गयी जैसे कुछ हुआ ही न हो।

कोई और दिन होता तो बात अवश्य बढ़ जाती। शायद पूरे दिन का काम भी रुक जाता। परन्तु आज कोई साधारण दिन नहीं था। कारुणि इस दिन के इंतज़ार में न जाने कितने सपने न्योछावर कर चुकी थी। आज रात की गाड़ी से विवेक वापस आ रहा था। ' इंटेलीजेंस ब्यूरो वाले भी न जाने किस घाट के कीचड़ हैं। नौकरी के नाम पर बेचारे को कहीं भी जमा देते हैं। न जान की चिंता, न कल की फिक्र। ये भी तो ड्यूटी के लिए हमेशा आगे रहता है और यहाँ अगले सम्पर्क तक मेरी सांसें अटकी रहती हैं।'
ख़ैर, उसने अपनी इस स्थिति का फैसला स्वयं किया था। पिताजी के उस फोन से लेकर आजतक उसने इसका अफ़सोस नहीं किया। फिलहाल विवेक के आने से पहले उसे तीन बार साफ किये जा चुके घर में पुनः एक चक्कर झाड़ू का देना था। उसने आने से पूर्व ही गाजर का हलवा और बनारसी दम आलू तैयार कर लिए थे। उन्हें बस मक्के की रोटी के साथ गर्म करके परोसना रह गया था। फिर तो सिर्फ राधा के आँखों की चमक थी और कृष्ण का खाली पतीला।

अब तक वो तीस का आँकड़ा पार कर चुकी थी। बाकी लोग भी मौसम का लगभग सही अनुमान लगा चुके थे। शायद यही कारण था कि डॉक्टर के निरीक्षण पर होते हुए भी हवा मानो फाग की बह रही थी। सभी को सर्द की गलन से ये बदलाव अधिक भा रहा था। इसी लचीलेपन में एक बच्चा बत्तीसवें बिस्तर से सटे विशेष कक्ष की चौखट पर छूट गया था। नये परिजन इस बात को जान लें कि इस अस्पताल में संक्रमण को ध्यान में रखकर बच्चों के लिए कुछ कड़े नियम हैं जिनकी अवमानना पर अधिकारी से प्रसाद प्राप्त होता है। आज न जाने किसका पर्चा कटा था।

कारुणि ने बच्चे की ओर नज़र घुमाई पर किसी को आगे बढ़ते न देख वो समझ गयी, " ये निश्चय ही नन्दा जी के साथ होगा।" नन्दा जी को इस बार विशेष कक्ष प्रदान हुआ था। वे उम्मीद से थीं तथा दो-तीन दिन ही शेष रह गए थे उनके प्रसव को। उसने देखा वो बच्चा आँख बंद किये कुछ बड़बड़ा रहा था। राजबन्धु मिष्ठान के राजभोग के जैसे उसके गालों और उसके मासूम चेहरे ने डॉक्टर को अपनी ओर खींच ही लिया।

कारुणि ने उसके घुंघराले बालों पर हाथ फेरते हुए पूछा, " क्या हुआ गोलू? किससे बात कर रहे हो?" उसने जो उत्तर दिया उसे सुनकर कारुणि अंदर तक हिल गयी। आश्चर्यजनक था यह देखना कि कैसे एक अबोध बालक की बातों ने एक परिपक्व वयस्क के हृदय को छलनी कर दिया। उसके शब्द-शूलों ने उसके एक पुराने कर्क पर वार किया।

उस रात कारुणि घर नहीं गयी। उधर भारतीय रेल की पुरानी आदत ने विवेक को भी पटरियों पर ही अटकाए रखा। अपनी मेज़ की दीवार के पीछे अपनी उँगलियों को आपस में उलझाए वो बुत हो गयी। कहीं तरुणाई की लपट पर किसी ने दोबारा जल छिड़क दिया था।

उस बच्चे ने अपनी माँ की वाणी दोहराई थी।
" हमें बेटी नहीं चाहिए। बेटा अगर मनमानी भी करेगा तो लौटकर घर ही आएगा।"
                               -  सुखदेव।

Saturday, 10 November 2018

दीपोत्सव : इस बार

आज की रात पूरे देश के लिए एक साधारण रात होगी। एक ऐसी रात जिसमें पिताजी के समक्ष बच्चों की पटाखों-कपड़ों-मिठाइयों की ज़िद अंततः नींद में आ चुकी होगी। छोटे बच्चे स्वयं सो भी चुके होंगे। घर का बड़ा बेटा बाबा-आजी के पाँव दबाकर उन्हें शुभ रात्रि कह चुका होगा। छोटी बहन भी भैया से दिन की व्याख्या खत्म कर रही होगी। चाचा जी खेत के काम निपटाकर अन्नपूर्णा का प्रसाद ग्रहण कर रहे होंगे। चाची बस उनके फ़ारिग होने की राह तक रही होंगी ताकि अपने भी दिन का अंत कर सकें। पापाजी भी दफ़्तर से लौटकर, भोजन के पश्चात दूध पीते हुए परिवार में कल पर विचार कर रहे होंगे। रह-रहकर उनके ललाट पर शिकन की रेखाएँ भी उभर रही होंगी। बगल में माँ कभी अपने पति का, कभी अपनी सास की दवाओं का, कभी घर की लाडलियों का तो कभी सुबह के बादाम का ख्याल करते हुए उन पर अपनी व्यस्तता न्योछावर कर रही होंगी। आँगन में वहीं कहीं कोने में उनकी चेतना ने स्वयं की परवाह को सुबह झाड़ू के बगल में छोड़ा होगा जो अब भी अपनी बारी की उम्मीद लिए ऊँघ रहा होगा।

        इन सबके लिए आज की रात अपने साथ आज तक कि समस्याओं को लेकर विदा हो जाएगी। प्रातः उदित होने वाला सूरज इन्हें एक नई आशा प्रदान करेगा। नये उत्साह के साथ, एक नए उन्माद में वे अपने धर्म से साक्षात्कार करने अपने कर्तव्य-पथ पर बढ़ चलेंगे।
      
         परन्तु, इस सरल रात्रि का अनुभव सिर्फ बिहार-झारखण्ड जैसे पिछड़े राज्यों में संस्कृति सँवारते, दक्षिण में मेट्रो शब्द के उल्लेख से भी दूर पड़ोसी की खैर जाँचते, पूर्वोत्तर में प्रकृति को अपने रक्त से सींचते, पश्चिम में रेत से सनी साँसों में ममत्व फेंटते तथा शीश पर पत्थरबाज़ों के मध्य कश्मीरियत बचाते ग्रामीण ही कर सकते हैं। जी हाँ, दीपावली की अमावस्या इस वर्ष हम शहरवालों और इस सरस् निशा के बीच की दूरी के बढ़ते व्यास को प्रज्ज्वलित करती गयी है। कितना अजीब है ना मानो ये समूचा देश वैसे किसी परिवार के गाँव में ही सिमटकर रह गया हो तथा हमारे शहरों-हमारी दिल्ली के हिस्से आयी हो सिर्फ उपभोक्तावाद के कोख से जनि अभद्रता, क्रूरता, बेशर्मी, धर्मान्धता तथा द्वेष।

                                     इस दीपावली ने यह सब परिलक्षित कर दिया हमें। ये पाँच जो किसी भी विनाश के परिचायक होते हैं अपने कम-से-कम एक उदाहरण मनन हेतु छोड़ गए हैं सामाजिक पटल पर। अभद्रता हमें तब दिखती है जब एक कथिक महान क्रिकेट बल्लेबाज़ किसी नागरिक की अभिव्यक्ति को एक निरंकुश शासक की भाँति ख़ारिज करते हुए उद्वेलित हो उठता है बिना इस बात की परवाह किये की उसके इस आचरण से सफलता की ओर मुँह बाये कितने अभ्यर्थियों को ऊँचाई के इस स्वरूप से उदासीनता ही प्राप्त होगी। किसको अच्छा लगेगा कि जिसका स्वप्न हम सँजोये हों उसमें दम्भ का तिनका-मात्र भी अक्स प्रदर्शित होता हो? इससे किसी व्यक्ति-विशेष को तो फ़र्क नहीं पड़ेगा किन्तु एक विशेष-व्यक्ति ज़रूर आम बनकर रह जाएगा। क्या अपने आदर्शों की ऐसी स्थिति चाहिए हमें?

               क्रूरता हमें तब दिखती है जब हमारी राष्ट्रीय राजधानी के ही समीप मेरठ नामक शहर में एक युवा, एक नन्हीं-सी जान के दाँतों के बीच पटाख़े की विपदा को गति देकर खुश होता है। यह भी होता है दिल्ली की छत्र-छाया तले।

                    बेशर्मी हमें दीपावली बीते दो रातों के पश्चात आकाश में गुंजायमान होती आतिशबाज़ी के रूप में दिखाई देती है। एक ऐसा सम्वेदनशील समय जब पर्यावरण की पीड़ासनी चीखें हमारे यन्त्रों को आपातकालीन स्थिति की ओर संकेत करने को बाध्य कर रही हैं। तब हमारी दिल्ली के ही पिता-महाराज अपनी बच्चियों को "प्रदूषण-मास्क" लगाकर पटाखे जलाने में सहायता कर रहे हैं। क्या ऐसे निर्माण होगा टिकाऊ विकास के आधारों पर वातावरण के हितकर भविष्य का?

                धर्मान्धता का परिचय वो समूचा जीवित वर्ग देता है इन शहरों में जो विज्ञान और विधान की कसौटी पर खरे उतरे हुए उच्च न्यायालय के फैसले की अवमानना को अपने धर्म की अवधारणा का विजय मानता है। यह तो अनागत काल ही बताएगा कि किस शहरी का धर्म बचेगा जब आज की ये दानवी प्रवृत्ति अवनि को बिलखते शिशुओं के समक्ष ही मृत्यु के घाट उतार देगी।

               अंततः, द्वेष का रूप हम तब देखते हैं जब माँ वीणापाणि के सान्निध्य में पड़े दो शिष्य इसी दिल्ली शहर में दीपोत्सव के शोर-शराबे में अपने घर की यादों का काढ़ा पीकर सो जाने को मजबूर थे क्योंकि गाँव में प्रेम की चाश्नी में डुबोये रखने वाले रिश्तेदार इस शहर के मिज़ाज में ढल-से गए, क्योकिं पड़ोसी का तमगा थामे बैठी आबादी को अपने व्हाट्सएप्प संदेशों से ही फ़ुर्सत नहीं मिली, क्योंकि बाबा की शामों में भगवान का दर्जा पाने वाले गुरुजन भी अपनी निजी जीवन के वज़न में दबे रह गए, क्योंकि सबके लिए बैठाई गयी सरकार के लिए तो विद्यार्थी अस्तित्व में ही नहीं हैं। बस वो कमरे में रोज़ भ्रमण पर आने वाली छुछुन्दर ही थी जो आयी, और उनके साथ प्रसाद साझा करती गयी। शायद किसी बिल्ली ने पंजा मारा था उसे। दाएं तरफ का पिछला पैर शिथिल हो चला था तथा पीठ पर उस तरफ कुछ खरोंच थी। रात के साढ़े ग्यारह बजे जब बाहर के सभ्य-समाज में विस्फोटकों का शोर जारी था, उसका डरते-बचते आना गाँव के माली चाचा की स्मृति ऊभार कर चला गया।

                             ये दिल्ली शहर की दिवाली थी जहाँ दिल का तो दीवाला निकल चुका है और एक हमारे गाँव हैं जहाँ आज भी एक पिता अपने दूर किसी शहर में धूल फाँकते पुत्र को यादकर उसके परममित्र पर डाँट के आशीर्वाद निःसंकोच फैला देता है तथा वो मित्र भी उस स्नेह को पाकर, उस डाँट रूपी चादर में लिपटी प्रेम और उम्मीद की शीतलता की अनुभूति कर स्वयं को भाग्यवान महसूस करता है। ये दिल्ली, ये शहर, यहाँ एक नब्ज़ भी दूसरी के प्रवाह पर अपनी अधीरता को रोक ले तो बहुत है।
                                           - सुखदेव।

Friday, 26 October 2018

प्रकृति की द्युति

क्यों पेड़ काटने की खातिर,
तू जन-जन में अलख जगाये।
मानो लूटने पाण्डु-पुत्रों को,
मामा शकुनि जी खुद आये।

वो जूए का लिए बहाना,
राजसभा में गये समाये।
आसन पाते ही मातुल के,
कुंती-तनुज गए चकराए।

सभी सुतों पर छाते ही वो,
नीच सोच पर उतरे आये।
बोलै पाँचों को उकसाकर,
क्यों ना सब पर खेली जाए?

काल का देख के आगत रंग,
मामा मन ही मन हर्षाये।
क्यों ना इसी बहाने इनसे,
प्रतिष्ठा भी छीनी जाए।

भँवर में घिरकर उनके आखिर,
नाँव-पाण्डवी गोते खाये।
फँस उनकी चालों में "धर्मी",
पत्नी पर दी चाल गँवाये।

हुई यही सबसे बड़ी गलती,
हक़ इसका वो कैसे पाएं?
एक नारी के नारीत्व पर,
कैसे कोई भी दाँव लगाए?

गयीं घसीटी वहीं थी देवी,
भीम से भी ना देखा जाए।
शान्त रह गए सहदेव-नकुल भी,
अर्जुन भी बैठे आँख चुराए।

टूट चुकी उस अबला ने फिर,
हार के अपने हाथ उठाये।
तब आकर बंशीधर ने फिर,
पट के झटपट पाट बढाये।

किसी तरह जा बची बेचारी,
जो सबकी ताकत कहलाये।
अंत मे वो ही धूमिल होती,
जाने क्यों बेचारी हो जाये?

सोच ज़रा इसपर ओ भईया!
ऐसे कैसे काम चलाएँ।
आज तो जैसे द्रुपद-सुता-सी,
माता धरती भी चिल्लाये।

हम जैसे निष्प्राण जनों में,
मैय्या अपनी आस जगाये।
शायद कभी उठेंगे हम भी,
देंगे उसका चीर बढाये।

इतने लगा दें दरख्तों को कि,
चहुँ ओर हरियाली छाये।
लेकिन कहाँ हुआ ऐसा कुछ,
हम बैठे जो शीश नवाये।

हाथ जोड़कर करें विनतियाँ,
उनसे जो हँसते ही जाएँ।
"क्यों बनकर तुमहीं दुस्साषन,
वसन पे उनके आँख गड़ाए?"

वो अवनि, बहना बन अपनी;
या भाभी बन बाहर जाए।
दादी-सी झुकती-रुकती या,
सखियों-सी चलती इठलाये।

उसपर तेरी काली छाया तब,
मौत-सी पीछे ही मंडराए।
हम जैसे लाचार जवाँ तब,
कपड़ों में ही दोषों को पाएँ।

क्या ये तरु भी इस तरुणी की,
अबतक अस्मत नहीं बचाये?
फिर काहे तू बूझ-समझकर,
पाप करने को आगे आये?

भूल नहीं इन वृक्ष-पात ने,
हैं सदियों से लाज बचाये।
तेरे भ्रात-तात, जननी-पत्नी को,
शौचालय अब जाकर भाये।

कैसे इतना निर्लज्ज होकर,
देगा तू इनको कटवाए?
जबकि सारी तनुजाओं के,
वस्त्रों का तू प्रहरी कहलाये।

सो अपना जब समय आ रहा,
क्यों ना तुझसे प्रायश्चित करवाएं।
तेरी इन बेड़ियों से सबको,
क्यों मुक्ति दे दी ना जाये।

तू ही है जो अरावली के जख्मों पर,
दिया था परिसर में मुस्काये।
और नदियों को जोड़, रुला कर;
रहता सुरा में सदा नहाये।

तूने ही गाँधी विहार में,
सत्य दबाकर, घर बनवाये।
या भट्टा परसौल में जाकर,
रुपयों से मुजरे करवाये।

तूने ही गंगा-जमुना को,
नालों-से चेहरे दिलवाये।
दक्षिण में कावेरी पर भी,
तूने हीं झगड़े करवाये।

तूने ही तो महँगाई में,
कृषकों के सपने जलवाए।
रोते नन्हें हाथों में भी,
भिक्षा के लोटे दिलवाये।

गाज़ीपुर में भी तूने ही,
कूड़े के पर्वत उठवाए।
जैसे तेरा काम यही हो,
मंगल में दंगल करवाये।

लोकतंत्र में बैठे-बैठे,
जनता का बस ध्यान बंटाए।
और समय पाते ही झट से,
पर्यावरण पे दहशत ढाये।

क्या लगा तुझे, तू ऐसे ही;
अविरल धुन में बढ़ता जाए।
कोई तुझे देखे भी ना,
कोई उंगली भी उठने ना पाए।

माना है काफी सफल रहा तू,
पर बात यहाँ से बिगड़ी जाए।
तेरी उम्मीदों पर जल मढ़ने,
हैं कुछ उन्मत्त आगे आये।

तुझसे तो हमीं टकराएंगे,
जो मूल्यों के अब भी गुण गायें।
तेरी सन्तानों को ही शिक्षित कर,
तेरे कर्मों को देंगे बहवाए।
                                     - सुखदेव।