Search This Blog

Sunday, 18 May 2025

Sukhdev and his reflections

. 
What you see in the photograph is my life statement of the past year. Now I leave this building for a new one. I hope the next one becomes home to me. I will miss you a lot my students, my sunshine, my source of wisdom, my light of hope and I will never forget.

Wednesday, 29 April 2020

--- उम्मीद की आवाज़ ---


कभी रात जब रेल की यूँ,
आवाज़ सुनाई दे जाती है।
मन में ही मन मारे मानव को,
आगाज़ दिखाई दे जाती है।

एक आगाज़ जिसके होने भर से,
टूट जाएगा फिर लॉकडाउन,
बाहर निकलेंगे मानव और,
रख आएँगे सब भय डाउन,
भले अपने मन के ही तहखाने में,
कुछ जाने में, कई अन्जाने में।

परंतु, एक बात तो इस स्वप्न-सरीखे 
से छुपी नहीं,
वो बात जो धोखे के खंज़र-सी घुपी नहीं।
यही की इन सब के बीत जाने के बाद,
हमारा निज नाम कमाने के बाद,
ये भय कहीं नहीं जाएगा।
जहाँ होगा मानव,
इसे भी संग पायेगा।

ये मृत्यु का भय नहीं है।
ये निराशा का भय है।
समस्या भीतर बन्द होने में नहीं है।
उस बन्द होने के पाबन्द की समस्या है।
यही है वो जो मानव अपने बहन के विवाह पर सोचता है,
या किसी अन्य भोली और स्वच्छंद कन्या के लिए सोचता है,
या किसी ख़राब रिश्ते में स्वयं के लिए सोचता है।

यह वही भय है,
कि जब गाड़ी की सीटी सुनाई दे जाए।
पर उम्मीद न बने,
हताशा की कालिमा हटाई न जाये।

हे बहन! ऐसे में तुम नौकरी धर लेना,
कमाना बहुत के
रकम से खामियाँ ढक लेना।
तुम्हारा जीना फिर सरल हो जाएगा।
किसी और गले,
बेरोज़गारी का जमा, गरल हो जाएगा।

हे कन्या! तुम जो भी हो,
जैसी भी हो?
अपना प्रतिकार अमर रखना।
उस रेल की ध्वनि परखने को,
सदैव कसकर कमर रखना।

हे मानव! तुम अपनी ही बात पर क्या हल लोगे?
हो जाएगी सुबह, व्यर्थ ही पल लोगे।
अपनी दृष्टि में बस गोचर रखना।
हर कर्म को दृष्टिगोचर रखना।
वैसे जीना बस, जीना नहीं,
साधना होती है।
सत्य का यथार्थ और यथार्थ का सत्य जानना ही,
उस पूज्य गाड़ी की असल आराधना होती है।

जीवन का कोई भी कोरोना हो,
या वक़्त का कोई तंग कोना हो,
अपने शर्तों पर यूँ ही अड़े रहना,
सुनने को पटरियों पर भागती वह तान,
अपनी चेतना के कान खड़े रखना।
                               - सुखदेव।




Sunday, 19 April 2020

धर्म की बात


भारतीय समाज अपने धर्म-ग्रंथों के पन्नों से ही अपने समय-पथ पर अग्रसर होता रहा है। आदिकाल में जब सतयुग हो या वर्तमान का कलियुग, इन्हीं ग्रंथों ने हमें दिशा दिखाई है और पुरातन की सत्यता से रूबरू कराया है। अब उस सत्यता का यथार्थ ज्ञात करना तो हमारे विवेक की साधना पर आश्रित है। बहरहाल, इन ग्रंथों में मैं प्रभु श्री राम और श्री कृष्ण से काफी प्रभावित रहता हूँ। एक अलग-सा लगाव है इनसे जो इनके काल, इनके जीवन और इनसे जुड़ी लेखनी से बाँधे रखता है।
इनके व्यक्तित्व का महत्व और भी तब बढ़ जाता है, जब इनका व्यक्तित्व इनके काल-खंड का द्योतक बन कर, काल-पटल पर उभर आता है। सतयुग ने श्री हरीशचंद्र स्वरूप में एक व्यक्तित्व को प्रदर्शित किया। त्रेतायुग ने समस्त मानवीय रूपों में केवल श्री राम की सरसता में ही अपनी मर्यादा को परिलक्षित किया। द्वापरयुग में श्री कृष्ण की सर्वशक्तिमान छवि और उनकी कलाओं की अधिकता, उस युग की जटिलता को आज भी प्रज्ज्वलित रखते हैं। अन्तः मेरी कलियुगे ! इसी आस में इतने वर्ष बिता चुकी है कि काश किसी ऐसी आत्मा का बाह्यशरीर इसकी धरा को अनुग्रहित कर पाए। मानने वाले श्री कल्कि को उस पूर्णरूपेण, ध्रुवीय परिचय में देखते हैं। किंतु, कलि की विडंबना ही यही रही है कि इस इंतज़ार में इसकी सभी मानवीय-घड़ियों में अपनी क्रीड़ा से कर्म को पूरित करने वाले मनुष्य ऐसे ही व्यक्तित्व के अभाव में, स्वतः अपने विचारों, अपनी क्रियाओं को किसी ऐसे पक्ष में बाँट लेते हैं जो उन्हें श्रीराम-सा मर्यादापुरुषोत्तम और श्रीकृष्ण-सा सशक्त बना देता है। यह छद्म-स्वरूप उनका, केवल अपनी मिथ्या में ही सीमित रहता है। लेकिन, इस मृगतृष्णा से वे ख़ुद को इस हद तक परिपूर्ण महसूस कर पाते हैं कि तुरन्त हर किसी-न-किसी को ईर्ष्या से लिप्त अपने शाब्दिक बाणों से घायल कर देते हैं।

कलियुग के ये भ्रमित लोग, समाज के लिए सबसे बड़ा ख़तरा हैं। उनकी छद्म परिपूर्णता जो उनकी लघुता का परिचायक है, उन्हें कुछ भी नया सोचने या नया करने से रोके रखेगी। समाज में कुछ बेहतर करने वाले लोग उनकी आँखों को फूटे नहीं समायेंगे। यही लोग कल्कि के आगमन में विलंब का कारण बनेंगे। उनके आगमन पर, उनके प्रथम विरोधी भी यही होंगे। भगवत स्वरूप के समान स्वयं को बनाने का उद्देश्य रखना गलत नहीं है। गलत है बिना कुछ किये, बगैर रघुकुल-तिलक-सी विरह सहे, बिना किशन-सा संघर्ष किये, उनके पद पर अपने आप को देखना। गरुण-पुराण में इसके लिए अलग से सज़ा होनी चाहिए। इससे अधिक घातक कोई मादकता नहीं। सोच को खत्म करने का इससे कोई बड़ा मार्ग नहीं। 


कौन हैं ऐसे लोग?

जो चार चेहरों पर चार बातें करें,
जो बच्चों को झूठा बनाते चलें,
जिन्हें हिज़्र में कमजोरी दिखे,
जो प्रणाम को भी ठुकरातें चलें।
कुछ उदाहरण आसपास से :-
जो आज भी ड्यूटी करने वालों के लिए बुरी नियत पाले हुए हैं,
जिन्हें सिया-राम का विछोह ज्ञात नहीं हो रहा हो,
जो "आज का समय ही खराब हो गया है" बोलकर चुप बैठे हों,
जो तनख्वाह नहीं पा रहे शिक्षकों की स्थिति देखकर भी सरकार के साथ हो,
जो चाटुकारिता में अव्वल हों,
जो लोगों के परिवार तोड़ते हों,
जो मुफ्तखोर हों,
जो इनका गौरकर्ता हो,
जो आलस पर ही मरता हो।


निदान : 

सबके पक्षों को समझिए।
बातों को स्पष्ट रखिये।
अपनी गलती को मानिए।
राजनीति को जूते की नोक पर रखिये।
शिक्षकों के सम्पर्क में रहिये। उनकी बात थामिए। 
यही धर्म की बात है।

Thursday, 16 April 2020

New updates arriving tomorrow.

 
ये अपने गेहूँ की बाली,
पीछे संध्या की लाली।
माँ आ भी जाओ बचाने,
कब तक पीटूँ मैं थाली।
             - सुखदेव 

Tuesday, 14 April 2020

---- कोरोनामर्दिनि-स्तुति ----

नमन तुम्हें दुर्गे है मेरा,
नमन करो स्वीकार।
सृष्टि अबकी त्राहि-त्राहि करे,
में जन-जन हाहाकार।
दुर्गे नमन करो स्वीकार।

ड्यूटी पर जितने हैं कर्मी,
है उचित जहाँ व्यवहार।
निश्चित हैं सच्चे वो धर्मी,
जय नव-पीढी के कुम्हार।
दुर्गे नमन करो स्वीकार।

इस संकट में नासिका हमारी,
भीगी जैसे करतार।
है बन बैठी जब नाक तुम्हारी,
अब खींच भी लो तलवार।
दुर्गे नमन करो स्वीकार।

ये असुर भी हैं पूरे ही ततपर,
जहाँ लोग बने हथियार।
हम बाँधें हैं हाथों को कसकर,
केवल तुम्हीं रही आसार।
मैय्या नमन करो स्वीकार।

अबतक जितना है जग में,
सब आपका ही तो है अम्बार।
कृपा सदा बस बनी रहे औ,
ग्रहण हो सबके नित आभार।
दुर्गे नमन करो स्वीकार।

आपकी दृष्टि होती है जो,
होते हैं निज पर उपकार।
इस जीवन में साँसों के संगी,
हैं जुड़े आपके सब उपहार।
दुर्गे नमन करो स्वीकार।

कुल की हो तुम अनंत मातु-वट,
तुम्हें सब दिन पूजे हैं नर-नार।
सदा निश्चिंत हो ध्यावें सब धन,
तुम सबकी पालनहार।
दुर्गे नमन करो स्वीकार।

देवी वैष्णव, काली, अम्बा, कपालिनी;
अन्नपूर्णा, जगदम्बे, शक्ति, कोरोनामर्दिनि;
जय विंध्यवासिनी, भवानी, ताराचण्डी;
माँ मुंडेश्वरी, शारदा, महिषासुरमर्दिनि;
हे कोरोनामर्दिनि, नमस्ते जीवन-दायिनी।
सुखदेव-नमन देवी धरें, नमस्ते नारायणी।

इस कर्म-युग में


मैं हार गया हूँ अपनों से।
अपने ही सपनों से।
इन साँसों की कड़ियों की,
मुस्काती लड़ियों से।
मैं हार गया हूँ अपनों से।

मेरा यह अंतहीन समाज,
रह गया हीन बस आज।
रण में बचाव की एक ही छत,
कर रही वितान को आगाज़।
मैं टूट रहा इन कथनों से।
मैं हार गया हूँ अपनों से।

न जाने किस कुंठा का सार,
 पर झुके-झुके परिवार,
मेरी रामायण का धोबी बन,
कहाँ तक गिरेगा ये संसार।
अब ऊब के इन सब व्यसनों से,
मैं हार गया हूँ अपनों से।

जब राम गमन-वन को जायें,
क्यों कैकयी सिया को तड़पाये?
रावण-हरण भी लघु दिखे जब,
श्री जटायु कुटुम्ब देख थर्राए।
हनुमन्त मौन अब जपनों से।
मैं हार गया हूँ अपनों से।

ये प्रश्न मेरा कोई ले जाये।
प्रभु के कर्ण पठा आये।
लखन-भरत जब शांत रहे,
सीता को संग क्यों ना लाये?
मैं दब-सा गया इन प्रश्नों से।
मैं हार गया हूँ अपनों से।
                      - सुखदेव।

Monday, 23 March 2020

त्रयी तमाम तारतीं

आज इस अमर-त्रयी को, नमन भी ज़रा-सा कीजिये।
आज इस अजर-त्रयी को, शर्म भी ज़रा-सा कीजिये।
वक़्त के बस मापदण्ड हैं जो गए बदले अभी तक,
आज इस अधर-त्रयी को, गर्म भी ज़रा-सा कीजिये।

आज इस अगर-त्रयी को, गमन भी ज़रा-सा कीजिये।
आज इस अपर-त्रयी को, नर्म भी ज़रा-सा कीजिये।
बंदिशें जो मस्तकों की हैं बन चुकी गाढ़ी हिजाब,
आज इस असर-त्रयी को, कर्म भी ज़रा-सा कीजिये।

आप जग में आज भी मजमा लगाए लीन हैं,
धन्य तीनों प्राण थे जो प्राण में अब लीन हैं।
                                 - सुखदेव।

अमर-त्रयी - तीनों शहीद
अजर-त्रयी - तीसरी तारीख ( बीस के बाद की )
अधर-त्रयी - वेद-first three
अगर-त्रयी - मानव जीवन के तीन संशय 
अपर-त्रयी - मानव जीवन की तीन क्षमता से अधिक आँकी गई पहलुएं
असर-त्रयी - मानव जीवन के तीन छद्म नियंत्रक

Wednesday, 11 March 2020

होलीय रंगों की कुछ छींटें

बीत गयी होली।

फोन पर आशीषों के अंबार लगे,
कम्पनियों के लाभों के व्यापार लगे।
परिवार आज फिर एक संग नहीं हो पाया,
जब रोटी-ड्यूटी की डटकर हुँकार लगे।

भला हो गाँव से दूर,
इस शहरी वीराने में रहते,
सगे-सम्बन्धियों का।
बुआ के हाथ की रोटी,
फूफाजी की विरासत,
और बच्चों की निश्छलता,
इन्हें तो याद रखना होगा।

यही दर्शन घूम रहा था आज भी -

रोटी का निवाला अवश्य ही,
भारी है हमारा।
इतने पर्वों की उदासियाँ जो समेटे बैठा है।

पापाजी का पार्विक सान्निध्य,
माँ का वास्तविक स्पर्श,
बाची से गुफ्तगू,
सन्तन कला विज्ञ,
माई का कुशल-क्षेम,
चाची की रसोई,
चाचाजी का गर्व,
सत्या-सिया की नक्को-सन्तति - 
इन सभी के ऊपर स्थान पाए,
श्री श्री विलायती कीकड़ जी महाराज।

अबकी अपनी असली,
यही रही होली।

होली की असीम शुभकामनाएं।

PC : Vikas Kumar.


Monday, 9 March 2020

Another year, another women's day


Happy Women's day to all the women out there. 
We - the current generation of this world, belong to a society that has a history of writing histories. We may be a part of an accident cult, a peace-loving community, a goal driven crusade, a truth seeking culture or the sanatan dharm. But, we all have a similarity that is unnoticed to none. We are all part of a lineage that finds solace in sexual polarity and gender-based inequalities. All our societies have : 
a man that by every passing day, is transforming more and more into Super Man, (in his own praise-laden words), and
a woman that by all means is represented by analogies that show her in weak light, keeping here tied in the shackles of the second-sex.

Every year, if we are aware, we can see a whole new colour to people's personality, around us. Based on the observations of the past years, I can proudly say that I am in acquaintance with women who have shown their capacity in every segment of life that an average student witnesses. I see them leading from the front when it comes to : 
teaching a class, 
silencing a mass,
rash-driving,
truth striving,
commencing a protest,
displaying detest,
sexist abuses,
rational excuses,
killing a gossip spree,
letting live literature's tree,
being the moral compass,
picking the bit of sass,
seeing the winter come,
emptying stacks of rum,
defying threats of COVID 19,
being ever ready for the unforseen,
having the back of family,
living the days all happily.
So I wish a very happy women's day to all women, all kinds of women. 
You all are the Super Women, which even Shaw could not perceive. 
Thank you for making this world, a less chaotic mess.
                     - Sukhdev.



खुरचन

खालि लोगों से भरा अपना भारत,
ख़ाली लोगों से भरता जा रहा है।
                                - सुखदेव।


Wednesday, 4 March 2020

AFFIRMATIONS

This is to notify that this blog is now ready to turn a new leaf. As per this change, I ask you to be ready for getting a new post every week accompanied with sections on photography, scientific research, questions to ponder upon and many more.

These are not just intentions but Affirmations for which I an determined to work hard.
Enjoy your stay.
Never by shy of showing your support.

hear your Say.

Thursday, 21 November 2019

Let the Unity Decide

Another Thursday comes to an end.

I wish I could call it "finish", instead of "end". But any grammatical upper hand cannot approve this because that's not true and without truth any lingual expression is spineless.

Now, dear Reader I hope my beginning does not disappoint you. Even if it does, please bear with me, as that's the best we do once we start something in the real world. Don't we?
If a student goes for the Science stream, she is forced to take it till her funeral-pyre. If an Engineer wants to switch his job, he first has to move past an even stronger social and emotional "HODOR". If a Bride yearns for the kiss of the divorce paper instead, she is better taken care of by Chitragupta's accounts. Isn't it true?
But, you were always quite and I command the same to you even now.
Further, stay calm as none of the above is out of the context here.

So, coming back to my "Thursday" we see that it is less of an Individual's day and more of the Mass' life. People spent their entire life counting the paces from home to work and this commute brings about their transformation from a potential form of life to a social jerk.

People do not have control over their own lives. They are driven only by the virtues and vistas of others. The Others here maybe their parents, their teachers, their friends, their bosses, their pasts, their religions, their sects, their doodhwalas, their neighbours, their "Sharma ji", their pets favourite snack seller and every other noun that you can come across.
Isn't this hillarious that in a generation where the Population claims to be the most Modern, the sole idea of an individual has got lost. Even that Constitutional Vote now matters in numbers and not in names.

For a second if we agree to parents being the towering figure above us because of them being the True form of God in this Universe in most cases, even then how do we explain the interference of the other Others?

Sadly, we do not have an answer. We can give some explainations to earn browney points here and there but, ultimately the unfortunate truth has to sink in.

Today, in the age of the clash of ideologies we have lost the relevance of ideas and if ideas do not define an individual, what else does?

Learn to appretiate your child's choice of colours over numbers, learn to promote your daughter's success in a field of opposite-sex or your son's efforts to be better at tears than jeers, learn to accept the Next Generation's choice in Partner and learn to opt for "their" experience over your "youthful zeal".

We also, need to move from our tendency to impress the multiples and need to shift the onus on letting the individual express himself/herself. Unless the Shiv and Shakti meet at each unit level the chaos would always exist. Thus, letting the Unity decide is of utmost importance.

Time is less for our rectifications on Earth but, there is a ray of hope in the belief that maybe if we try to improve ourselves as a species, Mother Nature forgives us.

Friday, 8 March 2019

महिला दिवस, '19

8 मार्च का स्वागत है लेकिन कुछ गौर करना आवश्यक है।

आज सभी के साथ हम सब भी "महिला दिवस" के माहौल में मश्गूल हैं। लोग जगह-जगह, मेरी तरह ही अपने उद्गार गिराते चल रहे हैं। पलट कर देखने पर किसी मवेशी द्वारा सड़क पर छोड़े गए अवशेष की तरह दिखाई दे रहे हैं ये। मात्र अनावश्यक गन्दगी।
हो भी क्यों न। ये ऐसा दिन है जिसकी आड़ में,
साल भर अपनी hipocracy और chauvinism में लिपटे कामों में लड़कियों पर शारीरिक और मानसिक अत्याचार करने वाले लोग,
आज के दिन का इस्तेमाल अपनी छवि सुधारने में करते हैं।
आश्चर्य होता है देखकर कि जिस व्यक्ति को एक क्षण नहीं लगता अपनी बातों से किसी दुपट्टे वाली की इज़्ज़त उतारते या दरवाज़े के पीछे से,
विरोध जता रही किसी "निक्करवाली" को औकात याद रखने की नसिहत देते।
वैसा नीच आदमी भी आज बैनर लेकर महिलाओं के हक़ की आवाज़ लगाने निकल पड़ता है।
इसलिए, उन सभी girls, sisters, ex-es, friends, enemies, professionals, aunts, mothers... से विनती है कि आप life में जिस भी social-role में व्यस्त हैं। ऐसे लोगों की हुँकारों से बचें। ये खलु जीव, आपके हौसलों के पर को सबसे पहले काटने आएंगे। इसलिए, हर किसी को परे रख सिर्फ, अपने आप को साथ लेकर आगे बढिए। इस लड़ाई में भाग्यवश, कोई आपके साथ नहीं खड़ा है।
सोचता हूँ क्या आप की महत्ता इतनी ही रह गयी है कि "एक दिन दे दिया न, अब कैंची जैसी ज़बान बन्द रखो।"
अपनी महिला वाले रूप से ऊपर उठिये। Equal rights के बदले EQUITY के लिए आवाज़ उठाइये।
आपको सम्मान इसलिए थोड़े ही मिलना चाहिए क्योंकि आपके किसी undeservant-male-counterpart को मज़बूरी में मिल रहा है। शायद इसीलिए, आज हम "महिला" दिवस मना रहे हैं।
महिला - पुरुष के विलोम का शब्द।
आप इतने में ही सिमटी हुई हैं क्या?
मैं नहीं मानता। आप तो नारी हैं, स्त्री हैं, औरत हैं, वनीता हैं, अबला हैं, कान्ता हैं, चपला हैं।
सब कुछ हैं बस इस तुच्छ पुरुष का विपरीत मात्र नहीं हैं।

Thursday, 28 February 2019

ये क्षणिक पुकार

चौकीदार हमारा अच्छा है।
पर संगत उसकी कैसी है?
इस पर चर्चा होनी होगी, जो;
अमन कि फिज़ा ऐसी है।

जिस उदित सूर्य में घर को हम,
बेटा अपना ले आएंगे।
उस शाम के ढलने से पहले,
उनको भी होश दिखाएंगे।
जो पर्चा लेकर घर-घर में,
जाकर के नाम बुलाते हैं।
कुछ को पहले ही विदा किये,
कुछ से नारे लगवाते हैं।
जो नारे उनकी मर्ज़ी के,
उनकी इच्छा को भाते हैं।
वो उन लोगों को चुनकर के,
औरों से परे हटाते हैं।
अपने निर्लज्ज मंचों से फिर,
उन्हें देशभक्त बतलाते हैं।
फिर उन सबको जो छूट गए,
पाशों में बाँधते जाते हैं।

क्या वक़्त है जब दूजे हमको,
संकल्प याद दिलवाते हैं?
अन्यथा उन्हीं के मुख हमको,
जाने क्या-क्या दर्शाते हैं।

इस पर भी तो प्रहरी अपना,
मौन नज़र ही आता है।
उसका विपक्ष भी छोड़ हमें,
तो राग भिन्न ही गाता है।

सुखदेव निराश न होना तुम,
जो दिखे वही हर बात कहें।
भूलो मत अपनी ही धरती पर,
आखिर रघु भी वन वास सहें।

वो बोलेंगे, दिल खोलेंगे;
मौके पर जी भर रो लेंगे।
पर तुम बस अपना थामो शर,
टिकना डटकर के चुनाव भर।
रामायण से जो भी दूर लगे,
उसे वोट न दो, उसे कर दो तर।

ढूँढो जिसे राम जी भाएँगे।
जिसे लखन लाल अपनाएंगे।
माँ सीता जिसको वर देगी,
औ भरत भ्रातृ हर्षाएँगे।

हाँ! प्रभु तुम्हारे अपने हों।
न किसी और के सपने हों।
हनुमत के सच्चे स्वामी हों,
न ही किंचित भी अभिमानी हों।

घबड़ाओ नहीं इस एकाकी में,
सबका मन तुमने है पढा नहीं।
ये वेदों की पावन भूमि है, इसने
निज-संघर्ष बिना कुछ गढ़ा नहीं।
                                - सुखदेव।